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।। सा विद्या या विमुक्तये ।।
श्री दर्शन महाविद्यालय
ॐ
भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत भाषा एवं वैदिक संस्कृति का उत्कृष्ट केंद्र।
विद्या और संस्कारों के इस पवित्र प्रांगण में आपका हार्दिक स्वागत है।
उत्कृष्ट शिक्षा प्रणाली
प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति एवं आधुनिक ज्ञान का अद्भुत संगम, जो छात्रों के सर्वांगीण विकास पर केंद्रित है。
शांत एवं प्राकृतिक वातावरण
अध्ययन और आध्यात्मिक विकास के लिए पूर्णतः अनुकूल, सुरक्षित और संस्कार युक्त प्राकृतिक परिवेश।
कार्यालय सूचना
• नवमी से पूर्णिमा / अमावस्या
।। स्थापना का इतिहास ।।
एक दिव्य स्वप्न से
महान संकल्प तक
बद्रीनाथ की ओर प्रस्थान करते हुए महाराज श्री जब १९०४ में मुनि की रेती में वटवृक्ष के नीचे रात्रि को विश्राम कर रहे थे, तो उन्होंने एक स्वप्न देखा कि वे कुछ बालकों को लेकर विद्यालय चला रहे हैं। इसी स्वप्न से विद्यालय की स्थापना का बीजांकुर प्रस्फुटित हो चुका था।
स्वामी जी ने स्वप्न को संकल्प रूप में परिणत कर उसको साकार करने का दृढ़ निश्चय कर लिया था। तपस्या के उपरांत सन् १९१० में महाराज श्री राघवाचार्य जी पुनः उसी स्थान मुनि की रेती में वापस लौट कर गंगा तट पर तप करने लगे तथा पूर्व स्वप्न संकल्प को मूर्त रूप देने, सनातन एवं वैदिक ज्ञान की रक्षा, प्रचार प्रसार एवं संरक्षण-संवर्धन हेतु गहन चिंतन में लग गए।
प्रधानाचार्य संदेश
ऋषि-मुनियों के तप से पवित्र हुई पर्वतों के राजा हिमालय की तलहटी में, कल-कल ध्वनि से अखंड गतिशील पिघली हुई बर्फ की निर्मल जलधारा से परिपूर्ण परम पावनी माँ भागीरथी जी के निकटस्थ तट पर तथा खिले हुए विभिन्न फूलों की सुगंध मिश्रित मंद-मंद प्रवाहित वायु और प्राकृतिक सौंदर्य से सुशोभित, विश्व प्रसिद्ध पर्यटक स्थल रामझूला के समीप स्थित श्री दर्शन महाविद्यालय के प्रथम सेवक होने के नाते, सभी संस्कृत अनुरागियों, संस्कृतज्ञों, प्रशासनिक अधिकारियों, प्रबन्धतन्त्र, शिक्षकों, कर्मचारियों, अभिभावकों एवं प्रिय छात्रों का हृदय से अभिनन्दन करते हुए मैं स्वयं को धन्य अनुभव करता हूँ।
धर्म, पुराण-इतिहास, दर्शनादि शास्त्रों का संरक्षण-संवर्धन, प्रचार-प्रसार तथा भारतीय सनातन संस्कृति परंपरा को आगे बढ़ाने एवं ज्ञानपिपासु छात्रों के व्यक्तित्व विकास के लिए प्रातः स्मरणीय योगिराज 1008 श्री राघवाचार्य महाराज जी के द्वारा सन् 1910 ई. में श्री दर्शन महाविद्यालय स्थापित किया गया है।
प्रथमा प्रथम से उत्तर मध्यमा द्वितीय पर्यन्त (कक्षा 6 से 12 तक) कक्षाओं की संबद्धता उत्तराखण्ड संस्कृत शिक्षा परिषद् तथा शास्त्री और आचार्य कक्षाओं की संबद्धता उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय से है।
डॉ. राधामोहन दास
प्रधानाचार्य
।। हमारी विशेषताएं ।।
महाविद्यालय की प्रमुख सुविधाएं
समृद्ध पुस्तकालय
वेद, पुराण, उपनिषद और विभिन्न दर्शन शास्त्रों के साथ-साथ आधुनिक संदर्भ ग्रंथों का विशाल एवं दुर्लभ संग्रह।
सुसज्जित छात्रावास
दूर-दराज से आने वाले छात्रों के लिए स्वच्छ, सुरक्षित और पूर्णतः सात्विक वातावरण युक्त आवासीय सुविधा।
विशाल यज्ञशाला
छात्रों के व्यावहारिक ज्ञान एवं आध्यात्मिक विकास हेतु नित्य संध्यावंदन, हवन एवं वैदिक कर्मकांड का नियमित अभ्यास।
आधुनिक कंप्यूटर कक्ष
प्राचीन शिक्षा के साथ आधुनिक युग की तकनीकी आवश्यकता को पूरा करने के लिए सुसज्जित कंप्यूटर लैब।
।। हमारी गौरवशाली परंपरा ।।
कॉलेज ट्रस्ट का इतिहास
महाराज श्री द्वारा स्थापित किए जाने के पश्चात श्री दर्शन महाविद्यालय ट्रस्ट निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर है। हमारे आदरणीय अध्यक्षों का नेतृत्व और योगदान इस प्रकार रहा है:
स्वामी श्री राघवाचार्य जी एवं स्वामी चिदानंद जी महाराज
स्थापना से १२ दिसम्बर १९७० तकट्रस्ट के प्रथम अध्यक्ष स्वयं वैकुंठ वासी १००८ स्वामी श्री राघवाचार्य जी महाराज रहे। उनके वैकुंठ गमन के पश्चात कुछ कालखण्ड तक दिव्य जीवन संघ के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद जी महाराज ने भी विद्यालय के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया।
श्री पुण्डरीकाक्षाचार्य जी
६ अप्रैल १९८१ तकतत्पश्चात् स्वामी राघवाचार्य जी के परम शिष्य एवं तत्कालीन प्रधानाचार्य, परम वैष्णव संत श्री पुण्डरीकाक्षाचार्य जी को स्वामी श्री चिदानंद जी महाराज ने नगर के प्रतिष्ठित संत-महात्माओं के साथ मिलकर विधिवत पट्टाभिषेक करते हुए अध्यक्ष के रूप में प्रतिस्थापित किया। उन्होंने अपनी ६८ वर्ष की आयु तक विद्यालय को अभूतपूर्व उन्नति प्रदान की।
श्री पूज्य धनेश शास्त्री जी
७ अप्रैल १९८१ — १६ अप्रैल २००१स्वतंत्रता संग्राम व उत्तराखंड स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व करने वाले महान सामाजिक कार्यकर्ता एवं गांधीवादी विचारक श्री शास्त्री जी ने सनातन धर्म की रक्षा हेतु अध्यक्ष पद सुशोभित किया। इनके कार्यकाल में विभिन्न गणमान्यों के सहयोग से कक्षों, भवनों और तत्कालीन सांसद मनोहर कान्त ध्यानी जी के सहयोग से अतिथि आवास का निर्माण सम्पन्न हुआ।
संत श्री गोपालाचार्य जी
१७ अप्रैल २००१ — १० अगस्त २०१७प्रख्यात सन्त, भागवत प्रवक्ता एवं रामचरितमानस के मर्मज्ञ श्री गोपालाचार्य जी को अध्यक्ष पद की बागडोर सौंपी गई। इन्होंने देश के विभिन्न स्थानों पर रह रहे अपने गुरु के अनेक शिष्यों को संरक्षक के रूप में आमंत्रित किया, जिन्होंने अन्न, वस्त्र एवं आर्थिक रूप से विद्यालय को सहयोग प्रदान किया।
आचार्य वंशीधर पोखरियाल जी
११ अगस्त २०१७ — वर्तमान तकपूर्व में ट्रस्ट के उपाध्यक्ष के रूप में कार्यरत, संस्कृत भाषा के विद्वान एवं शिक्षाविद आचार्य वंशीधर पोखरियाल जी ने संस्कृत एवं संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन हेतु विद्यालय के अध्यक्ष पद को संभाला और वर्तमान में भी संस्था का सफलतापूर्वक मार्गदर्शन कर रहे हैं।
।। संपर्क करें ।।
श्री दर्शन महाविद्यालय
सनातन धर्म, संस्कृत भाषा एवं वैदिक ज्ञान के संरक्षण और संवर्धन हेतु सदैव समर्पित। किसी भी जानकारी के लिए आप हमसे नीचे दिए गए माध्यमों से संपर्क कर सकते हैं।
हमारा पता:
मुनि की रेती, पो. – शिवानंदनगर,
ऋषिकेश, उत्तराखण्ड – 249137
फ़ोन नंबर:
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